NewsClick मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है—
जब कोई निर्दोष नागरिक महीनों या वर्षों तक जांच, मुकदमेबाजी, सामाजिक बदनामी, आर्थिक नुकसान और मानसिक पीड़ा झेलने के बाद अंततः निर्दोष साबित होता है, तो उसे क्या न्याय मिलता है?
अदालत किसी मामले को रद्द कर सकती है और कानूनी रूप से व्यक्ति की बेगुनाही बहाल कर सकती है। लेकिन वह बीता हुआ समय, खोए हुए अवसर, बर्बाद हुआ करियर, मानसिक आघात और परिवार द्वारा झेली गई पीड़ा वापस नहीं लौटा सकती।
यदि न्यायिक प्रक्रिया ही सज़ा बन जाए, तो केवल बरी होना पूर्ण न्याय नहीं है।
भारत को गलत अभियोजन (Wrongful Prosecution), दुर्भावनापूर्ण जांच (Malicious Investigation) और अन्यायपूर्ण कारावास (Unjust Incarceration) के शिकार लोगों के लिए मुआवज़े और पुनर्वास की स्पष्ट कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता है।
संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन का नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीवन का अधिकार देता है। जब राज्य की कार्रवाई किसी निर्दोष व्यक्ति को अपूरणीय क्षति पहुंचाती है, तो जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
एक मजबूत न्याय व्यवस्था की पहचान केवल दोषियों को दंडित करने से नहीं होती, बल्कि निर्दोषों की स्वतंत्रता, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने से भी होती है।
डॉ. एंथोनी राजू
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
चेयरमैन, नेशनल लीगल एड काउंसिल (NLAC)
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